Prasant Naidu.

आजादी के ६३ साल - या फिर बंदिश के
जीने की आजादी
या - आपनो में केद होने का गम
मरने का खोफ
या - आपनो से मरने का डर
सुबह के किरणों से प्यार
या - रात के ख़ामोशी से डर
आज़ादी के ६३ साल - क्या खोया, क्या पाया |

पाया वतन , अपनी मिटी
खोया हरयाली, ईट के मंजिलों तले
पाया चाँद को 
खोया धरती को जात और समाज के तराजू पर
पाया कामयाबी, शोहरत 
खोया अपनी धरोवर
आजादी के ६३ साल - या फिर बेबसी के

भूल  क्या खोया -पाया  के  बहीखाते को 
उठ  भारत के सपूत 
कर आज़ाद खुद को
कर  आज़ाद हम  सब के  भारत  को, हम सब के हिंद को |

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3 Responses
  1. wonderful poem!!
    I too wrote a poem for today :)


  2. Thanks for your comments, will read ur poem :)

    keep rocking,
    Prasant


  3. Vinnie Says:

    कर आज़ाद खुद को....

    i'll take this away with me, Thanks for sharing this beautiful yet strong piece!