आजादी के ६३ साल - या फिर बंदिश के
जीने की आजादी
या - आपनो में केद होने का गम
मरने का खोफ
या - आपनो से मरने का डर
सुबह के किरणों से प्यार
या - रात के ख़ामोशी से डर
आज़ादी के ६३ साल - क्या खोया, क्या पाया |
पाया वतन , अपनी मिटी
खोया हरयाली, ईट के मंजिलों तले
पाया चाँद को
खोया धरती को जात और समाज के तराजू पर
पाया कामयाबी, शोहरत
खोया अपनी धरोवर
आजादी के ६३ साल - या फिर बेबसी के
भूल क्या खोया -पाया के बहीखाते को
उठ भारत के सपूत
कर आज़ाद खुद को
कर आज़ाद हम सब के भारत को, हम सब के हिंद को |

wonderful poem!!
I too wrote a poem for today :)
Thanks for your comments, will read ur poem :)
keep rocking,
Prasant
कर आज़ाद खुद को....
i'll take this away with me, Thanks for sharing this beautiful yet strong piece!